दक्षिणी टॉरिड उल्का वृष्टि, Mausam Breaking: नवंबर माह की आगामी रातें खगोल प्रेमियों के लिए रोमांचक रहने वाली हैं। इस दौरान खगोलीय पिंडों की युतियां, परेड और उल्का वृष्टि का आकर्षण खास होगा।
4 और 5 नवंबर की दरमियानी रात ‘दक्षिणी टॉरिड उल्का वृष्टि’ या ‘उल्का बौछार’ अपने चरम पर होगी। इसका रेडिएंट प्वाइंट वृषभ तारामंडल में स्थित है।
यह घटना प्रकाश प्रदूषण से दूर साफ मौसम में बिना किसी खास उपकरण के आम आंखों से देखी जा सकती है।
गोरखपुर की चरमवीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला के खगोल विद अमरपाल सिंह के अनुसार, धूमकेतु 2पी/एंके के मलबे से बनी यह उल्का बौछार हर साल लगभग 10 सितंबर से 20 नवंबर के बीच सक्रिय रहती है। इसके कण लगभग 27 किमी प्रति सेकंड की अपेक्षाकृत धीमी गति से वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, जिससे वे आकाश में लंबे समय तक चमकते दिखते हैं।
उन्होंने बताया कि इसे 5 और 6 नवंबर की दरमियानी रात भोर तक भी देखा जा सकता है।
उनके अनुसार यह वार्षिक नियमित घटना है, हालांकि कुछ वर्षों में इसके कणों की संख्या सामान्य से अधिक और चमकीली हो जाती है। इसकी खासियत ‘हैलोवीन फायरबॉल्स’ हैं, जो कभी-कभी शुक्र ग्रह से भी ज्यादा चमकीले दिखाई देते हैं।
इस दौरान प्रति घंटे 5 से 10 उल्काएं या फायरबॉल्स दिख सकते हैं। ये आकार में धूल या कंकड़ जितने छोटे होते हैं, जो पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से पहले ही ऊपरी वायुमंडल में जलकर राख हो जाते हैं।














