चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (CCS HAU), हिसार भारत के प्रमुख कृषि विश्वविद्यालयों में से एक है। यह हरियाणा राज्य में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और किसानों तक तकनीक पहुँचाने का सबसे बड़ा केंद्र है। विश्वविद्यालय की स्थापना 1970 में हुई थी और आज यह हरियाणा के कृषि विस्तार तंत्र की रीढ़ माना जाता है।
एक नज़र में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय |
| स्थापना | 2 फरवरी 1970 |
| स्थान | हिसार, हरियाणा, भारत |
| प्रकार | राज्य कृषि विश्वविद्यालय |
| कुलपति | डॉ. बी. आर. कंबोज |
| पूर्व नाम | हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय |
| आधिकारिक वेबसाइट | hau.ac.in |
स्थापना और इतिहास
विश्वविद्यालय की शुरुआत 2 फरवरी 1970 को हुई। इससे पहले यह लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय का हिसार स्थित उपग्रह परिसर था। 1966 में हरियाणा राज्य के गठन के बाद इसे स्वायत्त संस्थान घोषित किया गया और राष्ट्रपति अध्यादेश के माध्यम से पूर्ण विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया।
इस अध्यादेश को बाद में हरियाणा एवं पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970 (संसद अधिनियम संख्या 16) के रूप में मंज़ूरी मिली, जो लोकसभा में 29 मार्च 1970 को पारित हुआ। उस समय विश्वविद्यालय का नाम हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय था और डॉ. ए. एल. फ़्लेचर इसके प्रथम कुलपति बने।
विश्वविद्यालय के चार आरंभिक महाविद्यालय हिसार में ही खोले गए — कृषि महाविद्यालय, मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय, पशु-विज्ञान महाविद्यालय और पशु-चिकित्सा महाविद्यालय। वर्ष 1971 में कौल (करनाल) में क्षेत्रीय परिसर, 1972 में क्रीड़ा महाविद्यालय तथा 1973 में गृह-विज्ञान महाविद्यालय की स्थापना हुई।
31 अक्टूबर 1991 को विश्वविद्यालय का नाम बदलकर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नाम पर रखा गया। 1992 में कृषि अभियंत्रण एवं तकनीकी महाविद्यालय जुड़ा। वर्ष 2010 में पशु-चिकित्सा एवं पशु-विज्ञान महाविद्यालयों को अलग करके लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (लुवास) बनाया गया।
शिक्षा और संकाय
विश्वविद्यालय में कृषि, बागवानी, कृषि अभियंत्रण, मौलिक विज्ञान, गृह विज्ञान तथा क्रीड़ा जैसे क्षेत्रों में स्नातक से लेकर शोध स्तर तक की पढ़ाई होती है। राज्य के 11 कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) भी इसी से जुड़े हैं, जहाँ किसानों को प्रशिक्षण और तकनीकी सलाह दी जाती है।
कृषि मौसम विज्ञान विभाग और किसान परामर्श
विश्वविद्यालय का कृषि मौसम विज्ञान विभाग मौसम संबंधी आँकड़े जुटाने और उनके आधार पर किसानों को व्यावहारिक सलाह देने का काम करता है। वर्तमान में विश्वविद्यालय भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ग्रामीण कृषि मौसम सेवा (Gramin Krishi Mausam Seva) के सहयोग से साप्ताहिक और दैनिक आधार पर फसल-वार परामर्श जारी करता है।
इन परामर्शों में आम तौर पर छह से आठ दिनों का पूर्वानुमान, सिंचाई की सलाह, बुवाई का सही समय, छिड़काव की अनुकूल परिस्थिति तथा रोग-कीट प्रबंधन की सिफारिशें शामिल रहती हैं।
मौसम परामर्श क्यों ज़रूरी है?
बदलती जलवायु के कारण हरियाणा के किसानों को पहले से ज़्यादा मुश्किलें मिल रही हैं:
- भारी गर्मी या लू — गेहूँ और सरसों में दाना पतला रह जाता है
- अनियमित मानसून — धान व कपास की बुवाई का समय बिगड़ जाता है
- शीतलहर और पाला — सरसों, चना और सब्ज़ियों को नुकसान
- तेज़ हवा व भारी बारिश — फसल गिरने और पानी भरने का ख़तरा
इसलिए समय पर मिली एक मौसम चेतावनी किसान का आधा नुकसान बचा सकती है। हिसार जैसी अधिक गर्मी वाले इलाके में यह जानकारी और भी कीमती हो जाती है।
शोध एवं उपलब्धियाँ
विश्वविद्यालय भारत के कृषि संस्थानों में सर्वाधिक शोधपत्र प्रकाशित करने वालों में गिना जाता है। इसकी विकसित किस्मों और तकनीकों ने हरियाणा में गेहूँ, चावल, कपास, सरसों और दलहन उत्पादन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसने देश की हरित क्रांति और श्वेत क्रांति में भी योगदान दिया। वर्ष 1997 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने इसे सर्वश्रेष्ठ संस्थान का सम्मान दिया।
निष्कर्ष
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार आज शिक्षा, अनुसंधान और किसान-हित की तीनों दिशाओं में सक्रिय है। इसका मौसम आधारित परामर्श तंत्र हरियाणा के किसानों के लिए बदलते मौसम में सुरक्षा कवच जैसा काम करता है। अगली बार जब आप खेत की योजना बनाएँ, तो विश्वविद्यालय या अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र से जारी मौसम परामर्श ज़रूर देख लें।
स्रोत: CCS HAU आधिकारिक जालस्थल, विश्वविद्यालय के तथ्य, भारत सरकार का हरियाणा एवं पंजाब कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1970।
संबंधित जानकारी पढ़ें: [हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय प्रवेश] (https://admissions.hau.ac.in/)














