लातूर अरहर फली मक्खी छिड़काव, Mausam Breaking (लातूर, महाराष्ट्र): महाराष्ट्र के लातूर जिले में अरहर (तूर) की फसल पर फली मक्खी (पॉड फ्लाई) का खतरा मंडरा रहा है। वसंतराव नाईक मराठवाड़ा कृषि विद्यापीठ, परभणी की ग्रामीण कृषि मौसम सेवा (जीकेएमएस) ने जिला स्तर पर जारी ताज़ा बुलेटिन में किसानों को सावधान किया है और छिड़काव के लिए दवा व मात्रा भी बता दी है।
3 नवंबर को जारी हुआ यह बुलेटिन (क्रमांक AAB 62/2026-27) 4 से 8 नवंबर तक के लिए वैध है। इस समय जिले में अरहर की फसल बढ़वार से फूल आने की अवस्था में है, जो फली मक्खी के हमले के लिए संवेदनशील मानी जाती है।
मराठवाड़ा क्षेत्र में अरहर एक प्रमुख दलहन फसल है, और फूल व फली लगने की अवस्था में कीट लगने से उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है, इसलिए समय पर नियंत्रण ज़रूरी बताया गया है।
बुलेटिन के मुताबिक फली मक्खी के नियंत्रण के लिए किसान साफ मौसम में 10 लीटर पानी में लैम्ब्डा-साइहेलोथ्रिन 5% ईसी की 8 मिलीलीटर मात्रा या लूफेन्यूरॉन 5.4% ईसी की 12 मिलीलीटर मात्रा घोलकर छिड़काव कर सकते हैं। दो में से कोई एक दवा इस्तेमाल करना काफी है।
बुलेटिन में साफ कहा गया है कि सिफारिश की गई दवा के घोल में अन्य कीटनाशक, फफूंदनाशक, पानी में घुलने वाली खाद या सूक्ष्म पोषक तत्व बिना ज़रूरत न मिलाएं। साथ ही उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों का पालन करें और कटाई से पहले दवा की तय प्रतीक्षा अवधि (वेटिंग पीरियड) का ध्यान रखें।
इसी बुलेटिन में फली छेदक (पॉड बोरर) कीट के लिए भी सलाह दी गई है, जिसमें नीम के बीज का अर्क, इमामेक्टिन बेंजोएट, स्पिनोसैड, इंडोक्साकार्ब, क्लोरएंट्रानिलिप्रोल या फ्लूबेंडामाइड जैसे विकल्प शामिल हैं। किसानों को फली छेदक की मौजूदगी समय पर पकड़ने के लिए प्रति एकड़ दो फेरोमोन ट्रैप लगाने और अंग्रेज़ी के “टी” अक्षर के आकार की पक्षी बैठने की खूंटियां (बर्ड पर्च) लगाने की सलाह दी गई है, जिससे पक्षी इल्लियों को खाकर कीट नियंत्रण में मदद करते हैं।
बुलेटिन में मौसम का हाल भी बताया गया है। 3 नवंबर को जिले के कुछ हिस्सों में गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम बारिश और 30-40 किलोमीटर प्रति घंटे की तेज़ हवा चली, जबकि 5 से 7 नवंबर के दौरान मौसम शुष्क रहने का अनुमान है।
आगे 6 से 12 नवंबर के बीच बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना जताई गई है, जिससे कीट प्रकोप पर मौसम का असर भी अहम होगा।
कृषि मौसम सेवा की सलाह है कि किसान नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग के कार्यालय से संपर्क कर अपने खेत की स्थिति के हिसाब से सही सलाह लें, क्योंकि कीट का असर खेत-दर-खेत अलग हो सकता है।
फली मक्खी की मादा कीट कच्ची फली के छिलके में अंडे देती है और उसमें से निकली इल्लियां दानों को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे फली के भीतर ही उपज खराब होने लगती है। यही वजह है कि बुलेटिन में फूल और फली बनने की शुरुआती अवस्था में ही छिड़काव की सलाह दी गई है, ताकि कीट का प्रकोप बढ़ने से पहले उसे रोका जा सके।
किसानों को यह भी सुझाव दिया गया है कि खेत का नियमित निरीक्षण करें और फली में छेद या अंडे दिखने पर समय रहते कार्रवाई करें, क्योंकि फसल पक जाने के बाद छिड़काव का फायदा सीमित रह जाता है।


