चक्रवात की आंख क्या होती है, Mausam Breaking: बंगाल की खाड़ी में उठे चक्रवात ‘मुरासु’ ने नवंबर की शुरुआत में आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में दस्तक देकर मौसम का रुख बदल दिया। 3 नवंबर 2026 की सुबह यह तूफान आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में ओंगोल के पास तट से टकराया।
इस दौरान हवा की अधिकतम निरंतर रफ्तार 100 से 110 किलोमीटर प्रति घंटा तक दर्ज की गई। हालांकि, जमीन से टकराने के बाद इसकी ताकत धीरे-धीरे कम होने लगी।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के 4 नवंबर के बुलेटिन के मुताबिक, मुरासु कमजोर होकर पूर्वी तेलंगाना और उससे सटे तटीय आंध्र प्रदेश के ऊपर एक अच्छी तरह चिह्नित कम दबाव वाले क्षेत्र में बदल गया था।
‘मुरासु’ तमिल भाषा का एक पारंपरिक शब्द है। इसका अर्थ बड़ा नगाड़ा या ढोल होता है।
पुराने समय में इसका इस्तेमाल युद्ध के दौरान सैनिकों को संकेत देने, लोगों को एकत्र करने और महत्वपूर्ण संदेश पहुंचाने के लिए किया जाता था।
तमिल संस्कृति में मुरासु का संबंध युद्ध के अलावा उत्सवों और सार्वजनिक घोषणाओं से भी रहा है।
इस चक्रवात को मुरासु नाम भारत ने दिया है। हालांकि, इसका नाम भारत ने इसलिए नहीं रखा क्योंकि तूफान आंध्र प्रदेश की ओर बढ़ रहा था।
दरअसल, हिंद महासागर क्षेत्र के लिए पहले से तैयार चक्रवातों के नामों की सूची में भारत की तरफ से दिया गया यह नाम शामिल था।
चक्रवात यानी Cyclone समुद्र के ऊपर बनने वाला एक शक्तिशाली कम दबाव वाला मौसमी तंत्र है। इसमें तेज हवाएं केंद्र के चारों ओर घूमती हैं और अपने साथ भारी बारिश तथा तूफानी परिस्थितियां लेकर आती हैं।
चक्रवात बनने के लिए समुद्र और वातावरण की कुछ विशेष परिस्थितियों का एक साथ मौजूद होना जरूरी है। सबसे जरूरी परिस्थितियों में से एक समुद्र के पानी का गर्म होना है।
सामान्यतः समुद्र की सतह का तापमान 26.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक होना अनुकूल माना जाता है।
गर्म समुद्र से बड़ी मात्रा में पानी वाष्प बनकर ऊपर उठता है। इससे वातावरण में नमी बढ़ती है, जो आगे चलकर बादलों और तूफान को ऊर्जा देती है।
जब गर्म और नमी वाली हवा समुद्र की सतह से ऊपर उठती है, तो नीचे अपेक्षाकृत कम दबाव का क्षेत्र बनने लगता है।
इस खाली स्थान को भरने के लिए आसपास की हवा तेजी से उस क्षेत्र की ओर बढ़ती है। इस तरह हवा का प्रवाह और बादलों का निर्माण लगातार बढ़ने लगता है।
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। इसके कारण चलती हुई हवाओं की दिशा में एक आभासी विक्षेप पैदा होता है, जिसे कोरिऑलिस प्रभाव (Coriolis Effect) कहते हैं।
इसी प्रभाव के कारण चक्रवात के आसपास की हवाएं घूमने लगती हैं। उत्तरी गोलार्ध में इनकी सामान्य दिशा वामावर्त यानी घड़ी की उल्टी दिशा में होती है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में ये दक्षिणावर्त दिशा में घूमती हैं।
यही वजह है कि भूमध्य रेखा के बिल्कुल पास चक्रवात विकसित होना मुश्किल होता है।
जब समुद्र से उठी नमी वाली हवा ऊपर जाकर ठंडी होती है, तो जलवाष्प संघनित होकर बादलों और बारिश में बदलती है। इस प्रक्रिया में गुप्त ऊष्मा (Latent Heat) निकलती है।
यह ऊष्मा वातावरण को ऊर्जा देती है और हवा के ऊपर उठने की प्रक्रिया को और मजबूत करती है। परिणामस्वरूप कम दबाव का क्षेत्र और शक्तिशाली होता जाता है।
हालांकि, हर कम दबाव वाला क्षेत्र चक्रवात नहीं बनता। समुद्र का तापमान, वातावरण में नमी, पृथ्वी का घूर्णन और ऊंचाई के साथ हवाओं की गति व दिशा में अंतर जैसे कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं।
आपने अक्सर सैटेलाइट तस्वीरों में चक्रवात के बीच में गोलाकार खाली जगह देखी होगी। इसे चक्रवात की आंख यानी Eye of Cyclone कहा जाता है।
यह चक्रवात का केंद्रीय हिस्सा होता है। इसके आसपास Eye Wall होती है, जहां बेहद तेज हवाएं और भारी बारिश देखने को मिल सकती है।
इसके बाहर बादलों की घुमावदार पट्टियां होती हैं, जिन्हें Spiral Rain Bands कहा जाता है। इन्हीं से कई इलाकों में भारी बारिश होती है।
ध्यान देने वाली बात है कि हर चक्रवात में स्पष्ट आंख नहीं दिखाई देती। यह आमतौर पर अधिक व्यवस्थित और शक्तिशाली चक्रवातों में विकसित होती है।
चक्रवातों के नाम रखने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाई गई है। इसके तहत विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) से जुड़ी क्षेत्रीय समितियां पहले से नामों की सूची तैयार करती हैं।
भारत, बांग्लादेश, ईरान, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, श्रीलंका, थाईलैंड, संयुक्त अरब अमीरात और यमन सहित कुल 13 देश उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र के नामकरण सिस्टम का हिस्सा हैं।
वर्ष 2020 में इस क्षेत्र के लिए 169 नामों की नई सूची लागू की गई थी। प्रत्येक देश ने इसमें 13 नामों का योगदान दिया था।
इस क्षेत्र में भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अंतर्गत नई दिल्ली स्थित क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्र (RSMC) चक्रवातों पर निगरानी रखता है और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उन्हें नाम देता है।
उत्तर हिंद महासागर क्षेत्र में जब कोई मौसमी सिस्टम 34 नॉट यानी लगभग 63 किलोमीटर प्रति घंटे की निरंतर सतही हवा की गति तक पहुंचकर चक्रवाती तूफान (Cyclonic Storm) बन जाता है, तब उसे सूची के अनुसार नाम दिया जाता है। इसका मतलब है कि केवल कम दबाव का क्षेत्र बनने पर किसी सिस्टम को चक्रवात का नाम नहीं मिल जाता।
बांग्लादेश की तरफ से दिए गए नाम ‘अर्नब’ (Arnab) के बाद भारत का नाम ‘मुरासु’ (Murasu) इस्तेमाल किया गया। इसके बाद सूची में ईरान का नाम ‘अकवान’ (Akvan) आता है।
यह क्रम पहले से निर्धारित सूची के अनुसार चलता है और इसका तूफान के भारत, बांग्लादेश या किसी अन्य देश में आने से कोई सीधा संबंध नहीं होता।
किसी चक्रवात का नाम उसकी गति, ताकत या उससे होने वाले नुकसान का संकेत नहीं देता। उदाहरण के लिए मुरासु नाम का अर्थ नगाड़ा है, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि तूफान कितना विनाशकारी होगा।
चक्रवात की वास्तविक ताकत का आकलन उसकी हवा की गति, वायुमंडलीय दबाव, बारिश, तूफानी लहरों और उसके संभावित रास्ते के आधार पर किया जाता है।
इसलिए किसी भी चक्रवात के दौरान मौसम विभाग की आधिकारिक चेतावनियों और स्थानीय प्रशासन के निर्देशों को गंभीरता से लेना जरूरी है।




