पंजाब-हरियाणा में मानसून कमजोर, मौसम ब्रेकिंग (चंडीगढ़): महीनेवार आंकड़ों में बारिश की कमी साफ तौर पर दिखाई दी है क्योंकि पंजाब में जून से सितंबर तक हर महीने सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। इस दौरान जून में 46 प्रतिशत, जुलाई में 26 प्रतिशत, अगस्त में 35 प्रतिशत और सितंबर में 62 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
हरियाणा के संदर्भ में बात करें तो वहां जून में 45 प्रतिशत, जुलाई में 27 प्रतिशत, अगस्त में 6 प्रतिशत और सितंबर में 44 प्रतिशत कम बारिश रिकॉर्ड की गई। इससे यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों राज्यों में मानसून के दौरान बारिश की यह कमी किसी एक महीने तक सीमित नहीं रही है।
मौसम विभाग के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 125 साल के रिकॉर्ड में पहले भी कई बार काफी बिगड़े हुए हालात देखे गए हैं। पंजाब में 1911 के दौरान मानसूनी बारिश में 51 प्रतिशत और 2014 में 49.2 प्रतिशत की कमी दर्ज होने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
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दूसरी ओर हरियाणा में 1987 का साल बेहद खराब मानसून वाले वर्षों में शामिल रहा है, जब बारिश का स्तर सामान्य से 63.6 प्रतिशत कम दर्ज किया गया था। इसके अलावा वर्ष 1918 में 56.9 प्रतिशत और 2014 में 56.5 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई थी।
इस बारिश की कमी का सीधा असर खेती पर पड़ने की पूरी संभावना है क्योंकि धान की फसल में कम बारिश के कारण सिंचाई की जरूरत काफी बढ़ सकती है। पानी की कमी के समय पौधों की सामान्य बढ़वार और दाने भरने की प्रक्रिया भी बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
गेहूं की इस फसल के लिए मानसून की कमी से मिट्टी और भूजल पर भारी दबाव बढ़ सकता है, जिसका असर अगली रबी फसल के लिए उपलब्ध सिंचाई पर भी पड़ सकता है। पर्याप्त बारिश न होने के कारण मिट्टी सूख सकती है और फसल को पानी देने की जरूरत बहुत जल्दी पड़ सकती है।
ट्यूबवेल से ज्यादा सिंचाई करने की स्थिति में बिजली, डीजल और पंपिंग का कुल खर्च काफी बढ़ सकता है जिससे खेती की लागत पर असर पड़ेगा। बारिश के अभाव में जमीन में पानी का पुनर्भरण कम होने से भूजल की स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है।
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फसल के अति संवेदनशील चरण के दौरान पानी की कमी होने पर कुल उपज घट सकती है हालांकि कितनी कमी होगी यह कई कारकों पर निर्भर करता है। बीज के अंकुरण से लेकर फल पकने तक फसल के हर चरण में पानी की उपलब्धता की अलग-अलग महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
कृषि वैज्ञानिक प्रो. हर्ष अय्यर का कहना है कि सूखा और गर्मी दोनों ही फसल के लिए काफी खतरनाक साबित होते हैं और यह समस्या सिर्फ पंजाब-हरियाणा तक सीमित नहीं है।
इसका सीधा असर फसल के उत्पादन, गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा, आर्थिक स्थिति और प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है।
मौसम विज्ञान केंद्र चंडीगढ़ के निदेशक डॉ. सुरेंद्र पाल के अनुसार 125 साल के रिकॉर्ड में बारिश के इन बदलते रुझानों को समझना बेहद जरूरी है।
वर्ष 2026 के मानसून पूर्वानुमान में भी पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई थी।









